बैठे पत्रकारों ने टोकाटोकी । आशुतोष ने कुछ ऐसी बातें कही , जिस पर लोगों ने एतराज जताया , बदमजगी जैसा माहौल हुआ और अपना भाषण बीच में छोड़कर आशुतोष अपनी सीट पर वापस आ गए । समारोह चलता रहा , पत्रकार और नेता अपनी बात कहते रहे लेकिन विचारों के टकराव का असर बाद के वक्ताओं के भाषण पर हावी हो गया ।करीब -करीब हर साल 11 जुलाई को होने वाले इस कार्यक्रम में दिल्ली के तमाम वरिष्ठ पत्रकार मौजूद थे। वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव इस कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे । वक्ताओं में थे कुलदीप नैयर , संतोष भारतीय , जी न्यूज के सलाहकार संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी , आईबीएन - 7 के आशुतोष , वरिष्ठ टीवी पत्रकार अलका सक्सेना , नई दुनिया के राजनीतिक संपादक विनोद अग्निहोत्री , आउटलुक हिन्दी के संपादक नीलाभ मिश्रा , एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर पंकज पचौरी , सीमा मुस्तफा । केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल , सीपीएम नेता सीताराम यचूरी , जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव समेत कई नेताओं ने भी पत्रकारों को भाषण पिलाया । विषय था - चुनाव और मीडिया की चुनौतियां ।

माहौल तभी से गरम हो गया था जब कपिल सिब्बल ने अपने भाषण में ये कह दिया कि हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है आप क्या लिखते हैं । उनका इशारा मीडिया की विश्वसनीयता की तरफ था । एक नेता का पत्रकारों की गोष्ठी में ये कह कर चले जाना इस बात का संकेत था कि नेता आज की तारीख में मीडिया की कितनी परवाह करते हैं । हर वक्ता के निशाने पर था ऐसे मीडिया संस्थान , जिन्होंने चुनाव के दौरान पैसे लेकर उम्मीदवारों से पैकेज डील किया । लाखों रूपए लेकर कवरेज दिया । बात तो यहीं से शुरू हुई लेकिन टीवी चैनलों पर चलने वाले कंटेंट पर सवाल उठाए गए ।
वरिष्ठ पत्रकार सीमा मुस्तफा ने कहा .....आज की तारीख में वैसे पत्रकार नहीं रह गए हैं , जो मिशन के तहत पत्रकारिता करते हैं । बाजार ने सबको अपने नियंत्रण में ले लिया है । साफ तौर पर उन्होंने कह दिया कि मीडिया अब बिकाऊ हो गया है । किसी जमाने में नेता जिस मीडिया की परवाह करते थे , अब वो उसे खरीद लेते हैं ....। सीमा मुस्तफा से पहले चौथी दुनिया के संस्थापक संपादक संतोष भारतीय ने भी मीडिया और आज की पत्रकारिता के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त की । संतोष भारतीय ने चुनावों के दौरान मीडिया के कवरेज , चुनावी सर्वे और भविष्यवाणियों के लागातार गलत साबित होने और पूरा का पूरा पेज बेच देने का मुद्दा उठाया ।
कुलदीप नैयर पहले ही चिंता व्यक्त कर चुके थे । इन वक्ताओं के बाद बारी थी आईबीएन - 7 के आशुतोष की । अपने चिरपरिचित अंदाज में आशुतोष ने बाजार के अस्तित्व को नकारने की प्रवृति को गलत बताते हुए कहा - समस्या ये है कि लोग आज भी 1947 या फिर 1977 की मानसिकता में जी रहे हैं । 2009 के समाज और उसमे आए बदलाव को स्वीकारने को तैयार नहीं है । इस माइंड सेट से सोचने से काम नहीं चलेगा । मैं नहीं मानता आज सारे पत्रकार बिक गए हैं .....। पत्रकारिता
रसातल या गर्त में चली गई है ....। अगर आज ये सच है तो 1977 में क्या पत्रकार नेताओं की गोद में बैठकर रिपोर्टिंग नहीं कर रहे थे .....। आशुतोष का इतना कहना था कि सामने बैठे तीन - चार पत्रकारों ने एतराज जताया । एक कोने में बैठे वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली ने कहा ....गलत कह रहे हैं आप ....1977 में ऐसा नहीं था ....। आशुतोष ने कहा ... ऐसा होता था ..। तभी दो - तीन पत्रकारों ने कहा ....आप ऐसा नहीं कह सकते ....मिसाल बताइए ...। किसी तरह से मंच संचालन कर रहे राहुल देव ने लोगों को शांत किया और संवाद को आगे बढ़ाया । आशुतोष ने बोलते - बोलते ये कह दिया कि हर वक्त एक सा नहीं होता ...समाज और हालात बदलते हैं । आशुतोष ने आगे कहा ...आज लोग कहते हैं कि गिरीलाल जैन जैसे पत्रकार नहीं है ...। मैं कहता हूं आज गिरीलाल जैन की जरूरत नहीं है । जवाहर लाल नेहरू तब थे ...। आज उनकी जरूरत नहीं है क्योंकि तब के हालात कुछ और थे । तब उन्होंने देश को एक दिशा दी आज संस्थाएं काम कर रही हैं ....किसी एक व्यक्ति पर नहीं है सबकुछ....इससे आगे आशुतोष कुछ बोलते कि कई पत्रकारों ने टोकाटोकी शुरू कर दी । लोगों को एतराज था कि आप कैसे कह सकते हैं कि आज जवाहरलाल नेहरू की जरूरत नहीं है .....। आशुतोष ने इस टोकाटोकी से नाराज होकर अपना भाषण बीच में ही छोड़ा और अपनी सीट पर जाकर बैठ गए । इसके बाद नंबर था सीताराम यचूरी का । सीताराम यचूरी ने बाकी बातें की लेकिन साथ - साथ ये भी कह गए कि मैं आशुतोष की बातों से सहमत नहीं हूं ....मेरे हिसाब से आज भी जवाहरलाल नेहरू की जरूरत है ..। ऐसे व्यक्तियों की हर समय जरूरत होती है ।
टीवी पत्रकार पंकज पचौरी भी अपने अंदाज में बहुत कुछ कह गए । पंकज ने कहा ...बाजार के दबाव को मानना होगा और आप लोगों को ये भी समझना होगा कि बहुत खर्चीला काम है मीडिया या चैनल को चलाना । अगर पैसे नहीं होंगे तो कहां से चलेंगे । लेकिन साथ ही उन्होंने लोगों की पवृति पर भी सवाल उठाए । उन्होंने कहा कि लोग अखबार के लिए या केबल कनेक्शन के लिए पैसे तो ढ़ीले नहीं करना चाहते हैं लेकिन कवरेज शानदार चाहते हैं। कहां से होगा कवरेज । रिपोर्टर को देश के तमाम इलाकों में भेजना बहुत खर्चीला होता है ....।
रसातल या गर्त में चली गई है ....। अगर आज ये सच है तो 1977 में क्या पत्रकार नेताओं की गोद में बैठकर रिपोर्टिंग नहीं कर रहे थे .....। आशुतोष का इतना कहना था कि सामने बैठे तीन - चार पत्रकारों ने एतराज जताया । एक कोने में बैठे वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली ने कहा ....गलत कह रहे हैं आप ....1977 में ऐसा नहीं था ....। आशुतोष ने कहा ... ऐसा होता था ..। तभी दो - तीन पत्रकारों ने कहा ....आप ऐसा नहीं कह सकते ....मिसाल बताइए ...। किसी तरह से मंच संचालन कर रहे राहुल देव ने लोगों को शांत किया और संवाद को आगे बढ़ाया । आशुतोष ने बोलते - बोलते ये कह दिया कि हर वक्त एक सा नहीं होता ...समाज और हालात बदलते हैं । आशुतोष ने आगे कहा ...आज लोग कहते हैं कि गिरीलाल जैन जैसे पत्रकार नहीं है ...। मैं कहता हूं आज गिरीलाल जैन की जरूरत नहीं है । जवाहर लाल नेहरू तब थे ...। आज उनकी जरूरत नहीं है क्योंकि तब के हालात कुछ और थे । तब उन्होंने देश को एक दिशा दी आज संस्थाएं काम कर रही हैं ....किसी एक व्यक्ति पर नहीं है सबकुछ....इससे आगे आशुतोष कुछ बोलते कि कई पत्रकारों ने टोकाटोकी शुरू कर दी । लोगों को एतराज था कि आप कैसे कह सकते हैं कि आज जवाहरलाल नेहरू की जरूरत नहीं है .....। आशुतोष ने इस टोकाटोकी से नाराज होकर अपना भाषण बीच में ही छोड़ा और अपनी सीट पर जाकर बैठ गए । इसके बाद नंबर था सीताराम यचूरी का । सीताराम यचूरी ने बाकी बातें की लेकिन साथ - साथ ये भी कह गए कि मैं आशुतोष की बातों से सहमत नहीं हूं ....मेरे हिसाब से आज भी जवाहरलाल नेहरू की जरूरत है ..। ऐसे व्यक्तियों की हर समय जरूरत होती है ।टीवी पत्रकार पंकज पचौरी भी अपने अंदाज में बहुत कुछ कह गए । पंकज ने कहा ...बाजार के दबाव को मानना होगा और आप लोगों को ये भी समझना होगा कि बहुत खर्चीला काम है मीडिया या चैनल को चलाना । अगर पैसे नहीं होंगे तो कहां से चलेंगे । लेकिन साथ ही उन्होंने लोगों की पवृति पर भी सवाल उठाए । उन्होंने कहा कि लोग अखबार के लिए या केबल कनेक्शन के लिए पैसे तो ढ़ीले नहीं करना चाहते हैं लेकिन कवरेज शानदार चाहते हैं। कहां से होगा कवरेज । रिपोर्टर को देश के तमाम इलाकों में भेजना बहुत खर्चीला होता है ....।
आउटलुक के संपादक नीलाभ मिश्रा ने बहुत मार्के की बात की । नीलाभ मिश्रा ने कहा मैं आज दर्शक , पाठक या जिसे बाजार उपभोक्ता कहता है , उसकी तरफ से बोलना चाहता हूं । उन्होंने कहा कि जैसे कोई भी धंधा का एक कानून के दायरे में आता है , रेगुलेशन होता है । अगर आप तेल बेच रहे हैं , तो आप तेल ही बेच सकते हैं । उसमें चर्बी की मिलावट करेंगे तो अपराध होगा और सजा मिलेगी, वैसे ही अगर आप खबर छाप रहे हैं तो खबर ही छापिए , उसमें मिलावट नहीं करिए । उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं को भी अधिकार होना चाहिए कि वो पूछ सकें कि भाई आपने तो अमुक चीज देने का वायदा किया था तो ये मिलावट क्यों ....।
अलका सक्सेना ने आशुतोष की बातों के असहमति जताते हुए कहा कि लोगों की जरूरत होती है । अगर नहीं होती है तो आज उदयन की भी जरूरत नहीं होती । पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने भाषण के शुरूआत में ही कहा कि आज पत्रकारों को ये बता देना चाहिए को वो किस पार्टी से जुड़े हैं ....उनकी विचारधारा क्या है । उन्होंने कहा कि जो लोग कह रहे हैं आज की पीढ़ी जिम्मा उठाने के लिए तैयार नहीं है तो वो गलतफहमी में है । जो लोग पहले से कुर्सियों पर बैठे हैं , उनकी जगह लेने के लिए लोग तैयार खड़े हैं .....। उन्होंने संपादकों को चुनौती देने वाले अंदाज में कहा कि बहुत से लोग साफ्ट स्टेंड भी लेना चाहते हैं और हार्ड स्टैंड भी । दोनों काम नहीं होगा ....। मीडिया पर बाजार के हावी होने के खिलाफ हर मंच से बोलने वाले प्रसून वाजपेयी ने यहां तक कहा कि अगर आज भी कोई अखबार मिशन के तहत पत्रकारिता के लिए मैदान में आ जाए तो आज जो पत्रकारिता हो रही है , वो खत्म हो जाएगी .....।
अलका सक्सेना ने आशुतोष की बातों के असहमति जताते हुए कहा कि लोगों की जरूरत होती है । अगर नहीं होती है तो आज उदयन की भी जरूरत नहीं होती । पुण्य प्रसून वाजपेयी ने अपने भाषण के शुरूआत में ही कहा कि आज पत्रकारों को ये बता देना चाहिए को वो किस पार्टी से जुड़े हैं ....उनकी विचारधारा क्या है । उन्होंने कहा कि जो लोग कह रहे हैं आज की पीढ़ी जिम्मा उठाने के लिए तैयार नहीं है तो वो गलतफहमी में है । जो लोग पहले से कुर्सियों पर बैठे हैं , उनकी जगह लेने के लिए लोग तैयार खड़े हैं .....। उन्होंने संपादकों को चुनौती देने वाले अंदाज में कहा कि बहुत से लोग साफ्ट स्टेंड भी लेना चाहते हैं और हार्ड स्टैंड भी । दोनों काम नहीं होगा ....। मीडिया पर बाजार के हावी होने के खिलाफ हर मंच से बोलने वाले प्रसून वाजपेयी ने यहां तक कहा कि अगर आज भी कोई अखबार मिशन के तहत पत्रकारिता के लिए मैदान में आ जाए तो आज जो पत्रकारिता हो रही है , वो खत्म हो जाएगी .....।
वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली ने काफी उत्तेजित होकर कहा ..आज हमारी हालत ये हो गई है कपिल सिब्बल आता है और हमारे मुंह पर तमाचा मारते हुए ये कह कर निकल जाता है कि आप कुछ भी छापते रहिए हमें कोई फर्क नहीं पड़ता ...। हम शर्मिंदा होने के सिवाय कुछ हीं कर सकते ....हम इस लायक भी नहीं थे कि उन्हें जवाब दे पाते ....। कुर्बान अली का गुस्सा और झल्लाहट साफ दिखा । नेता पत्रकारों के मंच पर आकर अगर कह जाए कि आज आपकी विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है , तो खंभा नोचने के अलावा कुछ करने लायक बच ही क्या जाता है । बहस तो यहीं से शुरू होनी चाहिए कि आखिर ये हुआ क्यों है ....।
कुलमिलाकर इतनी लंबी बहसबाजी के बीच हुआ वही जो हर सेमिनार या गोष्ठियों में होता है । दो विपरीत विचारधारा के लोग एक जगह जमा होकर एक दूसरे की सोच को कोसते हैं ...। चाय काफी पीते हैं ...। पकौड़े और सेंडविच खाते हैं और चले जाते हैं ...। नतीजा कुछ नहीं निकलता क्योंकि कोई एक दूसरे को न तो सही मानने को तैयार होता है , न ही कोई अपने विचारों से डिगने को तैयार होता है ...। टीवी वाले प्रिंट मीडिया को कमतर साबित करने की कोशिश करते हैं , प्रिंट वाले कहते हैं टीवी ने समाचारों की परीभाषा बदल कर सत्यानाश कर दिया । यहां इस बार मुद्दा टीवी मीडिया नहीं था , लेकिन इन दिनों पत्रकारिता से जुड़ी कोई भी बहस होती है तो शुरू चाहे जहां से हो खत्म टीवी मीडिया के गैरजिम्मेदाराना रवैया की निंदा से ही होती है ।
रविवार और संडे आबजर्वर जैसी पत्रिकाओं के संपादक रह चुके स्व उदयन शर्मा की पुण्यतिथि के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में वीपी हाउस का हॉल पत्रकारों से खचाखच भरा हुआ था । वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्ता , अनुप भटनागर , संजीव आचार्या , रेणु मित्तल , वीरेन्द्र सेंगर , बीबी नागपाल, आईआईएमसी के आनंद प्रधान , आलोक पुराणिक , आजतक के शैलेश , टीवी पत्रकार राजेश बादल , मुकेश कुमार , अमृता राय , सहारा समय के संजय ब्रागटा , जी न्यूज के वाशिन्द्र मिश्रा , वीओआई के जेपी दीवान , आजतक के सुमित अवस्थी , अमिताभ सिन्हा , एनडीटीवी के अखिलेश शर्मा , न्यूज 24 के अजीत अंजुम , सुप्रिय प्रसाद , टीवी पत्रकार कुमार राजेश , वरिष्ठ पत्रकार राजेश रपरिया , पुण्य प्रसून वाजेपयी , वीरेन्द्र मिश्रा , मशहूर ब्लॉगर अविनाश दास , भड़ास के संपादक यशवंत सिंह , विस्फोट डाट काम के संजय तिवारी समेत सौ से ज्यादा पत्रकार इस कार्यक्रम में मौजूद थे । आयोजन उदयन शर्मा के नाम पर बने ट्रस्ट ने किया था , जिसकी कर्ता - धर्ता उनकी पत्नी नीलिमा शर्मा हैं । उदयन शर्मा के बेटे कार्तिकेय शर्मा आजतक में हैं ।
रविवार और संडे आबजर्वर जैसी पत्रिकाओं के संपादक रह चुके स्व उदयन शर्मा की पुण्यतिथि के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में वीपी हाउस का हॉल पत्रकारों से खचाखच भरा हुआ था । वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्ता , अनुप भटनागर , संजीव आचार्या , रेणु मित्तल , वीरेन्द्र सेंगर , बीबी नागपाल, आईआईएमसी के आनंद प्रधान , आलोक पुराणिक , आजतक के शैलेश , टीवी पत्रकार राजेश बादल , मुकेश कुमार , अमृता राय , सहारा समय के संजय ब्रागटा , जी न्यूज के वाशिन्द्र मिश्रा , वीओआई के जेपी दीवान , आजतक के सुमित अवस्थी , अमिताभ सिन्हा , एनडीटीवी के अखिलेश शर्मा , न्यूज 24 के अजीत अंजुम , सुप्रिय प्रसाद , टीवी पत्रकार कुमार राजेश , वरिष्ठ पत्रकार राजेश रपरिया , पुण्य प्रसून वाजेपयी , वीरेन्द्र मिश्रा , मशहूर ब्लॉगर अविनाश दास , भड़ास के संपादक यशवंत सिंह , विस्फोट डाट काम के संजय तिवारी समेत सौ से ज्यादा पत्रकार इस कार्यक्रम में मौजूद थे । आयोजन उदयन शर्मा के नाम पर बने ट्रस्ट ने किया था , जिसकी कर्ता - धर्ता उनकी पत्नी नीलिमा शर्मा हैं । उदयन शर्मा के बेटे कार्तिकेय शर्मा आजतक में हैं ।

5 comments:
achchaa he..
कपिल सिब्बल जैसा नेता ही क्यों , मुझ जैसे साधारण लोग भी ऐसा ही कुछ महसूस करते है !
....मीडिया को आत्मालोचन की आवश्यकता है ! ... चाहे आज करें या कल !
भाई जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे...पैसे लेकर कवरेज की है तो तिलमिलाना कैसा ! मीडिया माने सब, न कि कोई व्यक्ति / चैनल विशेष. ठीक वैसे ही, जैसे नेता माने राजनीति. अगर मीडिया ठीक ठाक काम कर रहा होता राजनेताओं की ये कहने की हिम्मत ही नहीं होती.
ये तो होना ही था।
patrakaro ne apni izzat utarne k liye koi karm nahi chhor rakhe hai, kapil sibbal kya zilo k dm aur police station k s h o bhi patrakaro ki nahi sunte, jo hamari sunte wo ham par ahsaan karte hai
kumar bhawesh begusarai
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