Friday, November 13, 2009

न्यूज 24 के प्रोडयूसर शंभू झा लुटेरों के हत्थे चढ़े , लिफ्ट देने वालों ने मारा -पीटा और लूटा

नोएडा के फिल्मसिटी से चलने वाले न्यूज चैनल न्यूज 24 के प्रोडयूसर शंभू झा गुरूवार की रात कार पर घूमकर लूटने वाले लुटेरों के शिकार हो गए । शंभू झा ने नोएडा पुलिस में मामला दर्ज करा दिया है। मामला कुछ इस प्रकार है । गुरूवार की रात करीब साढ़े दस बजे शंभू झा फिल्मसिटी स्थित अपने दफ्तर से घर जाने के लिए निकले । फिल्मसिटी से बाहर निकलकर डीएनडी फ्लाइओवर के पास किसी कैब का इंतजार कर रहे थे । तभी एक मारुति कार उनके पास आकर रूकी और उन्हें लिफ्ट दे दिया । ये कार दरअसल लुटेरों की थी । कार में ही शंभू झा को कई किलोमीटर तक घुमाया गया और उनके पास से करीब आठ हजार रूपए लूट लिए । उनका मोबाइल फोन भी छिन लिया । इस बीच लुटेरे उन्हें इधर - उधर घुमाते रहे । उन्हें पीटते भी रहे ।
कुछ देर बाद उन्हें सूनसान इलाके में कार से धक्का देकर उतार दिया । शंभू झा वहां से न्यूज 24 के दफ्तर पहुंचे और फिर पुलिस में मामला दर्ज कराया । आज सुबह न्यूज 24 ने इस आशय की खबर भी चलाई ।

Wednesday, November 11, 2009

आजतक लुढ़का, न्यूज-24 उछला,नंबर दो की कुर्सी पर इंडिया टीवी बरकरार

आजतक नंबर पर कायम जरूर है,लेकिन उसे नुकसान हुआ है। इस हफ्ते उसका चैनल शेयर है-17.9% जबकि पिछले हफ्ते आजतक का चैनल शेयर 18.9% पर था यानी करीब 1 फीसदी का नुकसान। इंडिया टीवी अपने माम लटकों-झटकों के साथ नंबर दो है और उसका चैनल शेयर है-16.8%, पिछले हफ्ते वो 16.7 पर था। उधर स्टार न्यूज को भी इस हफ्ते कुछ प्वांइट का फायदा हुआ है। लंबे समय से नंबर तीन की कुर्सी पर बैठे स्टार न्यूज का चैनल शेयर इस बार 14.3% है, जबकि पिछले हफ्ते 14 फीसदी था।
चौथे नंबर के चैनल जी न्यूज के लिए यह हफ्ता भी फायदेमंद रहा । जी न्यूज .4 फीसदी उछल गया है । पांचवे नंबर के चैनल आईबीएन -7 को भी . 4 फीसदी का फायदा हुआ है,आईबीएन-7 का चैनल शेयर है-9.4%। छठे नंबर पर एनडीटीवी इंडिया है , जो टीआरपी बटोरने के लिए सारे तिकड़म भिडाने के बावजूद नंबर छह से ऊपर नहीं उठ पा रहा है । एनडीटीवी इंडिया के बाद कई महीनों से सहारा समय सातवें नंबर का चैनल था, लेकिन इस बार न्यूज 24 ने उसे तगड़ी पटखनी दे दी है। न्यूज-24 का चैनल शेयर है-6.2, जबकि सहारा समय 4.7% है। सहारा समय को . 3 का नुकसान हुआ है, लेकिन न्यूज-24 को लगभग . 8 का फायदा हुआ है।
अब एक नजर इस हफ्ते की टीआरपी पर ....
आजतक - 17.9 , इंडिया टीवी - 16.8 , स्टार न्यूज - 14.3 , जी न्यूज - 11.4 , आईबीएन - 9.4 , एनडीटीवी इंडिया - 8.6 , न्यूज 24 - 6.2, सहारा समय - 4.7 , डीडी न्यूज - 3.6, तेज -3.8 , लाइव इंडिया -2.5 , इंडिया न्यूज - 0.8

वीओआई के एंकर अतुल अग्रवाल सच नहीं बोल रहे हैं , जिनके आने के बाद चैनल डूबा , उन्हें ही तारणहार बता रहे हैं

मीडिया मार्ग पर वीओआई के बारे में इसी चैनल के एंकर अतुल अग्रवाल का एक लेख पोस्ट हुआ। अतुल ने चैनल शुरू होने की संभावनाएं जताते हुए जो कुछ भी लिख भेजा था , हमने उसे हूबहू पोस्ट कर दिया । उनके विचारों से हमारी सहमति जरूरी नहीं । उनके लेख के बाद हमें विनोद शुक्ला नाम के सज्जन ने अपनी प्रतिक्रिया भेजी है । विनोद शुक्ला का कहना है कि वो भी वीओआई में काम कर चुके हैं और अब स्वतंत्र रूप से अपना काम कर रहे हैं । विनोद शुक्ला ने जो कुछ लिखा है , अब आप उसे पढ़िए ।

अतुल अग्रवाल सच नहीं बोल रहे हैं - विनोद शुक्ला

वीओआई का बंद होना वाकई दुखद था। लेकिन हमें समझना होगा कि आखिर इतना बड़ा चैनल ऐसे कैसे बंद हो गया। बुरे से बुरे हालात से बावजूद आज़ादऔऱ एस 1 जैसे चैनल भी चल रहे हैं तो फिर वीओआई के साथ ऐसा क्या होगया? इस पूरे खेल में कहीं न कहीं को पेंच तो ज़रूर रहा होगा। कॉस्टकटिंग के नाम पर तो पहले ही कई लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका था। मतलब साफ है कि बचे-खुचे लोगों से ही प्रबंधन चैनल को चलानाचाहता था। उस वक्त तक हालात अगर सुधर नहीं रहे थे तो कम से कम सामान्य तो थे ही। अगर वीओआई के कर्मचारी और दूसरे तमाम लोग जो इस पूरे प्रकरण पर नज़र रखे हुए हैं, याद करें कि वीओआई के बेड़ा कब से डूबना शुरूहुआ। अमित सिन्हा के आगमन से। जी हां, वही अमित सिन्हा जिन्हे आज लोगएक भद्र पुरुष और संकट मोचक के रूप में देख रहे हैं। दरअसल वीओआई केकर्मचारी दो पाटों के बीच में पिस गए। ये आपसी बिज़नेस का चक्कर था,अमित सिन्हा और मित्तल ब्रदर्स के बीच में अटकी डील को पूरा कराने केलिए कर्मचारियों को बुरी तरह से इस्तेमाल किया गया। स्मरण हो कि ये सबनौटंकी और उठापटक श्रीमान्य अमित सिन्हा जी के आने के बाद ही शुरू हुईथी।
वास्तव में अमित सिन्हा और मित्तल ब्रदर्स के बीच में चैनल की डील कोलेकर बातचीत चल रही थी। इस दौरान सिन्हा साहब ने आनन-फानन में कुछधनराशि मित्तल बंधुओं को सौंप दी और कुछ वीओआई के कर्मचारियों मेंतनख्वाह के रूप इन्वेस्ट कर दी। इसे आप टोकन मनी समझ लीजिए। धीरे-धीरेमित्तल बंधुओं और अमित सिन्हा के बीच में डील फंसती हुई नज़र आने लगी।शुरुआत में बात हिस्सेदारी को लेकर हुई थी लेकिन सिन्हा साहब पूरेचैनल को खरीदने की बात कहने लगे। वही मित्तल बंधु चैनल को बेचना नहींचाहते थे क्योंकि उनके लिए ये एक रक्षा कवच की तरह था। इसी बात कोलेकर डील फंसने लगी। उधर सिन्हा साहब चैनल के सीनियर्स को अपने खेमेमें कर चुके थे इसलिए वो सिन्हा के गुण गाने लगे (आप देख ही रहे हैं,भक्त आज तक सिन्हा जी का कीर्तन कर रहे हैं)। फिर लेन-देन की बातों कोलेकर मामला और गंभीर होता चला गया और अमित सिन्हा को अपनी धन राशि(टोकन मनी आदि) भी डूबती हुई दिखाई दी।
मित्तल ब्रदर्स से हुए समझौते के मुताबिक अमित सिन्हा को पहलेडायरेक्टर बनाया गया था और सिन्हा साहब को ही तनख्वाह आदि का इंतज़ामकरना था। ऐसे में सिन्हा साहब ने मित्तल ब्रदर्स पर प्रेशर बनाने केलिए तनख्वाह रोक दी। एक महीने तक कर्मचारी काम करते रहे। ध्यान रहे इसदौरान अमित सिन्हा ने चैनल प्रमुखों से मिलकर एक नाटक रचा था। नाटकये था कि अमित सिन्हा वापस मुंबई जा रहे हैं क्योंकि किसी ने उनकेप्रति अपशब्दों का इस्तेमाल किया था। फिर सीनियर्स ने मान-मनौव्वल कानाटक रचा और सिन्हा साहब रुक गए। भला कोई किसी के अपशब्दों से क्षुब्धहोकर अपने करोंड़ों रुपये यूं ही छोड़ सकता है? नहीं न, तो यही था वोनाटक। फिर अगले महीने खबर आने लगी कि डील नहीं होगी और मित्तल बंधुखुद चैनल चलाएंगे। इससे पहले कि कुछ सकारात्मक होता अमित सिन्हा ने एकमहीने की तनख्वाह कर्मचारियों के अकाउंट में डाल दी। ऐसा करने का मकसदकर्मचारियों को अपने पक्ष में करना था। लेकिन असंतोष भड़कता रहा औरहड़ताल हो गई और। सिन्हा जी चाहते ही यही थे कि हड़ताल और मित्तलब्रदर्स पर दबाव बने।
खेल तो अब शुरू हुआ। हड़तालियों ने एक कदम आगे बढ़कर चैनल को ब्लैकआउट कर दिया। लेकिन उतने में ही एक झटका और लगा सिन्हा जी को। हरियाणासरकार ने करोड़ों रुपये का विज्ञापन वीओआई को दिया था। अब पैसा हासिलकरने के लिए विज्ञापन चलाना ज़रूरी था लेकिन चैनल तो ब्लैक आउट पड़ाथा। खुद का कदम उल्टा पड़ गया, अब विज्ञापन तो चलाना था, इसलिए उसेजैन टीवी का स्टूडियो हायर करके चलाया गया। जैन टीवी से चैनल ऑन करनेके पीछे पत्रकारिता की भावना और नैतिक दायित्व और तमाम बातें नहीं थी,सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना था। जैसे ही विज्ञापन की सीमा पूरी हुई,चैनल को जैन टीवी से भी ऑफ एय़र कर दिया गया। अगर इतनी ही तड़प थी चैनलके प्रति सम्मान बरतने की तो प्रसारण चलता रहता। जितना पैसा जैन टीवीको दिया गया उतने में तो कर्मचारियों की सैलेरी ही दे दी जाती।कर्मचारी सिर्फ वेतन ही तो मांग रहे थे न? यानि ये सब खेल चल रहा था।पता चलता है कि डील रद्द हो गई और चैनल बंद। धरने हुए, केस चले आदि-आदि।
इतने मे मित्तल ब्रदर्स के हवाले से खबर आई कि चैनल को जल्द ही चलायाजाएगा। इससे पहले मित्तल ब्रदर्स चैनल चलाने की प्रक्रिया शुरू करते,सिन्हा पार्टी ने नया दांव खेला। उन्होंने अपना चैनल लाने की घोषणा करदी। बाकायदा इसके लिए इंटरव्यू भी लिए गए और सभी को कम सैलरी में रखनेकी बात कही गई। ऐसे में सिन्हा मसीहा बनने की कोशिश करते नज़र आए।लेकिन इंटरव्यू के अगले ही दिन खबर आती है कि अमिस सिन्हा ने वीओआईखरीद लिया है। डील हो गई है, ये खबर सुनकर सभी हैरान रह गए। आखिर जोव्यक्ति नया चैनल लाने वाला था, एक रात के अंदर फिर कैसे वीओआई कोखरीद रहा है। यानि साफ है वीओआई को बंद कराकर अमित सिन्हा ने अपना हीफायदा देखा है। अपने लिए उसने एचओडी वगैरह को धनवर्षा करके अपने पक्षमें कर लिया और कर्मचारियों को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया।
चलिए अतुल साहब की बात पर ही गौर फरमाते हैं। जैन टीवी से चैनल चलानेमें मदद करने वाले जिन चंद लोगों का नाम उन्होंने सम्मान से लिए है,उनमें से कुछ वही लोग हैं जो हड़ताल कराने में अग्रणी थी। उन्हीं नेमदिरापान किया और उन्हीं ने गालियां भी निकालीं। एक ओर जो लोग चैनलबंद करा रहे हैं, दूसरी जगह से वो चला भी रहे हैं, ऐसा कैसे हो सकताहै। लेकिन दुख की बात है कि सुनने में आया है कि इन लोगों ने सिन्हासाहब से 5 लाख रुपये लिए थे ह़ड़ताल कराने के लिए। हैरानी की बात हैकि सेटलमेंट के लिए चेक भी अमित सिन्हा के आदमी दे रहे थे। वो भी बिनाहिसाब-किताब किए। सुनने में तो आय़ा है कि कई लोगों के चेक तो बाउंस भीहो रहे हैं।
सबकी आंखों के सामने इतना बड़ा नाटक रच दिया गया और किसी को कोई खबरनहीं। नासमझ हैं वो लोग अमित सिन्हा को दूध का धुला मान रहे हैं। वहव्यापारी है और व्यापारी सिर्फ अपना फायदा देखता है। माथे पर टीका,ज़ुंबा पर साईं नाम मात्र एक छलावा है। ऐसा आदमी कैसे चैनल को चलासकता है। वीओआई के कर्मचारियों और दूसरे लोगों जो वीओआई में जानाचाहते हैं, उन्हें यही सलाह दी जा सकती है सावधान! अबकी बार संभलने कामौका भी नहीं मिलेगा। और उनका महिमा मंडन करने वाले लोगों तो यही कहाजा सकता है.... कुछ तो शर्म करो यारो...

विनोद शुक्ला , वीओआई का एक पूर्व स्टाफ

Tuesday, November 10, 2009

मीडिया मार्ग पर वीओआई के एंकर अतुल अग्रवाल के लेख पर कुछ लोगों की तल्ख प्रतिक्रिया

मीडिया मार्ग को मेल के जरिए वीओआई न्यूज चैनल के एंकर अतुल अग्रवाल ने चैनल की भावी योजनाओं और बीते दिनों की घटनाओं के बारे में एक लेख लिख भेजा था । हमने उसे पोस्ट कर दिया क्योंकि हर आदमी को अपना पक्ष रखने का हक है । अब कुछ लोगों ने अतुल अग्रवाल के इस लेख पर अपनी तल्ख टिप्पणी भेजी है । किसी ने हमारी निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं । हम सिर्फ एक ही बात कह सकते हैं कि अतुल अग्रवाल ने अपनी बात रखी है , अगर आप में से किसी को लगता है कि वो गलतबयानी कर रहे हैं , तो आप भी अपनी बात रख सकते हैं । जिन सज्जन ने मेल भेजा है वो नहीं चाहते कि उनका नाम सार्वजनिक किया जाए ।

राज ठाकरे की गुंडागर्दी के खिलाफ दिन भर चली न्यूज चैनलों की मुहिम

आजतक , स्टार न्यूज , एनडीटीवी , जी न्यूज , आईबीएन -7 , न्यूज 24 और सहारा समय से लेकर लाइव इंडिया तक सभी चैनलों ने कल दिन भर राज ठाकरे की जहरीली राजनीति को जमकर कोसा लेकिन राज के उत्पाती विधायक और एमएनएस के नेता हर चैनल पर यही कहते रहे , हमने जो किया ठीक किया । सभी चैनलों के वरिष्ठ पत्रकार लोकतंत्र को शर्मशार कर देने वाली घटना के लिए एमएमएस नेताओं को घेरते रहे लेकिन किसी को कोई अफसोस नहीं ।
शिरीष पारकर , राम कदम और बागीश सारस्वत जैसे एमएनएन नेता चैनलों पर कहते रहे , हमने जो किया ठीक किया । आईबीएन -7 पर आशुतोष लगातार डटे हुए थे । अपने तेवर के लिए मशहू आशुतोष एमएनएन नेताओं को उनके किए के लिए खूब घेर रहे थे , उन्हें तीखे सवाल पूछ रहे थे लेकिन कहां फर्क पड़ने वाला था । अबू आजमी को थप्पड़ मारने वाले विधायक राम कदम और आशुतोष प्राइम टाइम में चैट के दौरान लगातार उलझे रहे । कोई हार मानने को तैयार नहीं । न सवाल पूछने वाला , न जवाब देने वाला लेकिन इस बहस से न नतीजा निकलना था , न निकला । एमएनएस नेता तो जैसे तय कर चुके हैं कि अपनी राजनीति चमकाने के लिए उन्हें गुंडागर्दी से भी बाज नहीं आना है । आईबीएन -7 ने अपने कार्यक्रम का नाम था - राज का गुंडाराज । हर रोज रात साढ़े आठ बजे टेलीकास्ट होने वाला एजेंडा भी इसी विषय पर केन्द्रित था । आईबीएन -7 दोपहर से इस मुद्दे पर बहुत आक्रामक था । आईबीएन के प्रबल प्रताप सिंह और नीरज गुप्ता लगातार एमएनएस की गुंडागर्दी पर सवाल उठा रहे थे ।
आजतक भी लगातार इसी खबर पर बना रहा । आजतक ने अपनी मुहिम को नाम दिया - बीस मिनट का गुंडाराज । प्राइम टाइम में अजय कुमार एमएनएस विधायक राम कदम और अबू आजमी के साथ चैट कर रहे थे । राम कदम जैसे नेताओं ने टीवी का खेल समझ लिया है । जोर - जोर से चिल्लाना और अपने विरोधियों पर हावी होना इनकी रणनीति है । अजय कुमार अपने अंदाज में अबू आजमी और राम कदम दोनों से सवाल दाग रहे थे ।
न्यूज 24 पर भी प्राइम टाइम में राजद्रोह नाम के कार्यक्रम में खूब बहस हुई । चैनल के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम वैसे तो दोपहर से ही एमएनएस नेताओं से जूझ रहे थे लेकिन प्राइम टाइम में न्यूज 24 ने एक घंटे का शो किया , जिसमें रामविलास पासवान , तारिक अनवर , हंगामा करने वाले विधायक राम कदम और एमएनएस नेता बागीश सारस्वत थे । एंकर कर रहीं थी अंजना कश्यप।
अजीत अंजुम ने एमएनएस नेताओं को डपटने वाले अंदाज में पूछा कि आपको महाराष्ट्र का ठेकेदार किसने बना दिया है , आप डेढ़ सौ सीट पर चुनाव लड़कर सिर्फ 13 जीते और चाहते हैं कि बाकी 275 विधायक आप जो चाहें वहीं करें , आप महाराष्ट्र को अपनी जागीर क्यों समझते हैं ? तो मुंबई से एमएनएस नेता पूरी बेशर्मी के साथ जवाब देते रहे । तारिक अनवर और एमएनएस नेता इस कदर भिड़े कि किसी को सुनना मुश्किल हो गया था । अजीत अंजुम के तल्ख सवालों के जवाब में एमएनएस नेता भी चिल्लाते जा रहे थे । चिल्ला - चिल्ली के बीच तारिक अनवर और पासवान की आवाज दब जा रही थी। एमएनएस के नेताओं की बेशर्मी और गुंडागर्दी करने के उनके इरादे इस बात की ओर इशारा कर रहे थे कि ये लोग किस हद तक जा सकते हैं ।

वीओआई का पुर्नजन्म, जल्दी होगा ऑन-एयर , खुशखबरी... खुशखबरी... खुशखबरी...

मीडिया मार्ग को मेल के जरिए वीओआई के अतुल अग्रवाल ने ये खबर भेजी है । गर ये सही है तो अच्छी बात है । बंद पड़ा कोई चैनल ऑन एयर हो जाए , इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। कई हफ्तों से कहा जा रहा है कि वोओआई अब ऑन एयर हुआ , तब ऑन एयर हुआ । इस बीच वीओआई की मशीनें वहां से ले जाने की खबरें भी आई । किसी को यकींन नहीं रहा कि वीओआई शुरू भी हो सकता है । इसके बावजूद अगर ये चैनल शुरू हो रहा है तो वाकई खुशखबरी है । वीओआई के एंकर अतुल अग्रवाल ने हमें जो कुछ लिख कर भेजा है , उसे हूबहू पोस्ट कर रहे हैं ।

वीओआई में काम करने वालों के लिए खुशखबरी. पूरे हिंदी मीडिया जगत के लिए अच्छी ख़बर. कुछ दिनों पहले अकाल मृत्यु को प्राप्त हो चुके हिंदी न्यूज़ चैनल 'वॉयस ऑफ इंडिया' का 'पुर्नजन्म' होने वाला है. वीओआई को अमित सिन्हा की पुख्ता सरपरस्ती हासिल हुई है और पक्के तौर पर माना जा रहा है कि इस बार वीओआई ज़रूर चलेगा. मित्तल बंधुओं से पूरी तरह से मालिकाना हक लेने और कंपनी का अधिग्रहण करने के बाद अमित सिन्हा ने बेहद गोपनीय तरीके से हर एक उलझन को सुलझा लिया है, हर एक फसाद को निपटा लिया है और मीडिया जगत को संदेश दिया है कि 'हम आ रहे हैं पूरी तैयारी के साथ'. दरअसल, वीओआई का पुर्नजन्म उन कर्मचारियों एवं पूर्व-कर्मचारियों के लिए संजीवनी है जिन्होने वीओआई की तरक्की के लिए अपना सब कुछ झोंक दिया, बिना तनख्वाह के भी चार-चार महीनों तक पूरी ईमानदारी से काम किया, पूर्व मैनेजमेंट की लातें-बातें सहीं और फिर भी कुछ न कहा, कुछ न किया. या यों कहें कि कुछ नहीं कर पाए अथवा कुछ न करने की हैसियत जुटा पाए. झटका उनके लिए ज़रूर होगा जिन्होने कुछ सिरफिरों की बातों में आकर 'सैलरी के लिए संघर्ष' का नारा बुलंद किया और अपने नापाक मंसूबों को अंजाम दे गए. परिणति ये कि चैनल का प्रसारण ठप्प हो गया. चैनल पर ताला जड़ गया. सैकड़ों लोग यकायक सड़क पर आ गए. एक तो पहले से दाल-रोटी के लाले पड़े थे, उपर से रही सही आस भी दगा दे गई. कइयों को मकान मालिक ने घर से बेघर कर दिया, कई खुद ही अपना बोरिया बिस्तरा लपेट कर घर-गांव लौट गए. कइयों को अपने बच्चों की फीस न दे पाने की वजह से सरेआम जलील होना पड़ा तो कई देनदारों के आगे गिड़गिड़ाते नज़र आए. यकीन मानिए, मेरे एक मित्र को तो अपना इलाज बीच में ही छोड़ कर घर वापस आ जाने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि उसके सारे पैसे चुक चुके थे. अच्छा दोस्त है मेरा, तो अकेले में दो आंसू गिरा कर दुख बांट लिया मुझसे. स्थिति मेरी भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी. घर से ठीक-ठाक हूं तो मां-पिता जी ने 'भेंट स्वरूप' कुछ रकम, किसी बहाने से जबरन हाथ में थमा दी तो तीन महीनों तक घर चला पाया. खैर, जब तक संघर्ष सैलरी के लिए था, तब तक तो ठीक था लेकिन जब ये संघर्ष निजी खुन्नस निकालने के मौके में परिवर्तित हो गया तो मामला गड़बड़ा गया. हमारा शानदार न्यूज़रूम चकलाघरों के ऐन बाहर लगने वाली मंडी जैसा नज़र आने लगा. खुद को बुद्धिजीवी बताने वाले लोग, मानसिक रोगियों की तरह फिज़ूल की बातों पर ठठा कर हंसने लगे. न्यूज़रूम के भीतर ही खुलेआम शराबखोरी करने लगे. कंप्यूटरों पर इंटरनेट के ज़रिए आपत्तिजनक हरकतें होने लगीं. ख़बरों के लिए पिटते की-बोर्ड्स, तरह-तरह के गेम्स के कमांड्स पर भोथरे होते चले गए. असाइंटमेंट पर रखे जिन फोन से ख़बरों के लिए तफ्तीश की जाती थी वो गाली-गलौच देने का ज़रिया बन गए. सैलरी के लिए संघर्ष उपद्रव में तब्दील होता नज़र आने लगा. ऐसा उपद्रव, ऐसा दंगा जिसकी न तो कोई दिशा थी और न ही कोई दशा. 'पेन डाऊन स्ट्राइक' इसलिए हुई थी कि हमें हमारी तनख्वाह और तमाम बकाया राशि प्राप्त हो जाए ताकि हम अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकें लेकिन अधकचरे ज्ञान, अनुभव की कमी और अति-उत्साह में पीड़ित कर्मचारियों ने ऐसे नौसिखियों के कांपते हाथों में अपना नेतृत्व थमा दिया जो स्थिति को नियंत्रित नहीं कर सके. जिसके जो मन आता वो करने लगा. अब तक आंदोलन पूरी तरह से दिग्भ्रमित हो चुका था. नेतृत्व दिशाहीन साबित हो चुका था. अनायास ही एक शाम न्यूज़रूम में भारी कोलाहल मचा. मैं अपने केबिन में बैठा था. कान लगाकर सुना तो पता चला कि दो-तीन नाशुक्रे हमारे डायरेक्टर अमित सिन्हा और ग्रुप एडिटर किशोर मालवीय के खिलाफ हाय-हाय और मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे, तमाम ऊल-जुलूल अपशब्द 'बक' रहे थे. इसके बाद सभी हेड ऑफ द डिपार्टमेंट की बारी आई. आउटपुट, इनपुट, असाइंमेंट, कॉपी, टिकर, प्रोग्रामिंग, ग्राफिक्स, आईटी, कैमरा, मार्केटिंग किसी को नहीं बख्शा बेशर्मों ने. जिसकी जिसकी याद आती गई उनके नाम ले-लेकर भद्दी-भद्दी गालियां निकालते गए वो जानवर. हमसे, हमारी पत्नियों, हमारी मां-बहनों और बच्चों से अनैतिक रिश्ते जोड़े जाने लगे. जब सारी हदें पार हो गईं तो मैं तमतमाया हुआ उठा, अपने केबिन से बाहर निकला लेकिन खुद से वायदा किया कि इन लोगों से लड़ूंगा नहीं. दफ्तर को प्रणाम किया और भारी मन से बाहर सड़क पर आ गया. मुझे व्यक्तिगत पीड़ा इस बात की थी कि वीओआई को 'ब्लैक आऊट' क्यों किया गया? चैनल को चलने तो दिया जाता, कम से कम मीडिया मार्केट में हमारी उतनी थू-थू तो न हुई होती. कहीं और नौकरी खोजने की गुंजाइश तो बाकी बची रहती? वीओआई को आगे बढ़ाने के लिए हमने बहुत मेहनत की थी. अपने ख्वाबों और आशाओं को नए सिरे से संजोया था हमने. ऐसा नहीं है कि जिन लोगों ने हड़ताल में हिस्सा लिया उन्होने मेहनत नहीं की. वो कहीं ज्यादा मेहनती और ईमानदार रहे होंगे जितने कि हम या फिर कोई और. उनकी सदाचारिता पर सवाल उठाने की हिमाकत नहीं कर रहा हूं मैं, पीड़ा उनकी 'बेवकूफाना' प्रतिक्रिया पर जता रहा हूं. वीओआई को बंद कराना... हे राम, ह्र्दय विदारक क्षण था वो. अपने सामने अपनी औलाद से बिछड़ने से बड़ा गम था वो. मित्तल बंधुओं से बारम्बार दंश झेलने के बावजूद और वीओआई से भावनात्मक लगाव के चलते अमित सिन्हा भी चैनल को किसी भी सूरत में ऑन एअर बनाए रखना चाहते थे. इस संकट की घड़ी में कई बार हमारी उनसे बातचीत होती, बैठकें होतीं. हर बार बेहद दुखी मन से वो कहते कि चैनल को चालू कराइए. चैनल को बंद करना समाधान नहीं है. चैनल चलता रहेगा तो हमारी रेपुटेशन बनी रहेगी. मैं सबको उनका आना-पाई से हिसाब दिलाऊंगा. भरोसा रखिए. अमित सिन्हा के विश्वास और किशोर मालवीय के निर्देशन के चलते हम सभी हेड ऑफ द डिपार्टमेन्ट्स ने अपनी-अपनी टीमों को समझाने-बुझाने की पुरज़ोर कोशिशें कीं. एकबारगी लगा कि लोग समझ रहे हैं लेकिन फिर कहीं 'ऊपर' से एक फ़रमान आया और स्टूडियो एवं सर्वर रूम में कुछ 'खास' लोगों ने ताला जड़ दिया. साफ हो गया था कि 'बागबां' ही अपने 'गुलिस्तां' को 'उजाड़ने पर आमादा' था. महज़ अपने निहित स्वार्थों के लिए सैकड़ों घरों के चूल्हे बुझाने की सनक सवार थी उस पर. अब लड़ाई धर्म और अधर्म की थी, न्याय और अन्याय की थी. ज़ुल्मी भारी पड़ता नज़र आ रहा था. उसके गुर्गे स्थिति को और भी विकट बनाने के लिए ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए हुए थे. उड़ती उड़ती खबरें तो ये भी आईं कि हड़तालियों को मुफ्त में शराब बांटी जा रही है. यानी 'दारू का स्पॉन्सर' भी बन गया था 'वो'. ऐसे में अमित सिन्हा ने लिया एक बड़ा फैसला. जैन टीवी का स्टूडियो किराए पर लेकर वहां से वीओआई को ऑन-एअर कराने का. जैन टीवी से पहला बुलेटिन मैनें एंकर किया और उसके बाद अख़लाक उस्मानी, दिनेश काण्डपाल, नेहा गुप्ता, चंदीप कौर, निधि शर्मा, राहिला रहमान, नावेद कुरैशी, अनूप सोनू ने एंकरिंग की वो वैराइटी पेश की, कि मज़ा आ गया. हमारे रिपोर्टरों सर्वेश शुक्ला, सचिन सिंह, संजय दुबे, संजय सिंह, राहुल कुमार ने खबरों को ब्रेक करना शुरू किया और नरेन्द्र कुमार, दुष्यंत सिंह, आदित्य त्रिपाठी, आनंद सिंह, अशोक उपाध्याय, अनिल जायसवाल, अकील हसन, अमिताभ सिन्हा, प्रभात पाण्डे, आशुतोष मिश्रा, राजीव गुप्ता, विजय यादव, प्रशांत नेमा, अजय राय, फसाहत यूसुफी, सौरभ कुनाल, राहुल, राकेश, पंकज सिंह इत्यादि ने डेस्क पर मोर्चा संभाल लिया. वरिष्ठजनों मधुरेन्द्र सिन्हा, जेपी दीवान, अजय कुमार, सर्वेश तिवारी, मीनू शर्मा और राहुल ठगेले की अगुआई में हमारी टीम ख़बरों से खेलने लगी. अमित जी का प्रयोग सौ फीसदी सफल रहा. ऐसे में अपने ही 'गुलिस्तां' को चौपट करने पर औतारू 'बागबां' और वीओआई के न्यूज़रूम में मौजूद उपद्रवियों की भीड़ भन्न हो गई. इनकी नाराज़गी इस बात पर थी कि हमने वीओआई को चालू कैसे करा लिया. बस फिर क्या था. एक के बाद एक फोन घनघनाने लगे. जैन टीवी गए हम लोगों को गालियां और धमकियां मिलने लगीं. हमने पुलिस को इत्तला की और जैसे तैसे 6 दिन बीते.एक दिन पता चला कि मित्तल बंधुओं और अमित सिन्हा के बीच करार टूट गया है. वीओआई की स्क्रीन पर फिर से 'अंधेरे का आशियाना' हो गया. हड़तालियों को लगा कि उन्होने जंग जीत ली. जैन टीवी जाने वालों को देख लेने की धमकियों में तेज़ी आ गई. अमित जी के खिलाफ तमाम तरह की अफवाहें फैलाई गईं. उन्हे बदनाम किया गया. दावे किए गये कि उनके पास पैसे नहीं है और वो चले आए वीओआई खरीदने. वगैरह-वगैरह. इसी बीच खुल्लम खुल्ला मार-पीट, सिर-फुटौव्वल, पुलिस और कचेहरी भी खूब हुई. लेकिन अंत भला तो सब भला. अमित सिन्हा ने वीओआई के कर्मचारियों से जो वायदा किया था, उसे पूरा करके दिखाया. डंके की चोट पर, पूरी तैयारियों के साथ वीओआई को न सिर्फ खरीदा बल्कि नए तौर-तरीकों के साथ उसे शुरू भी करने जा रहे हैं. ये वीओआई का पुर्नजन्म है. इस बार ये पौधा पूरा वृक्ष बनेगा. लोगों को शीतलता और सुख देगा. यहां पर अराजकता और अकर्मण्यता का कोई स्थान नहीं होगा... इंशाअल्लाह, ऐसा ही हो... वाकई, वीओआई का फिर से आना इस बात का साफ संकेत है कि 'सच्चे का बोलबाला और झूठे का मुंह काला'.

(लेखक अतुल अग्रवाल वीओआई के नेशनल चैनल के आऊटपुट हैड रहे हैं और रात नौ बजे के प्राइम टाइम बुलेटिन के एंकर भी. वो आईबीएन7, न्यूज़24, ज़ी न्यूज़ और डीडी न्यूज़ में भी काम कर चुके हैं. अतुल से मोबाइल नंबर 9910021189 या ई-मेल 29atul@in.com पर संपर्क किया जा सकता है.)

Saturday, November 7, 2009

नवभारत टाइम्स के संपादक रामकृपाल सिंह के नाम खुला पत्र - क्या प्रभाष जोशी के निधन की खबर आपको छापने लायक ही नहीं लगी ?

देश के सभी अखबारों में ( जागरण को छोड़कर ) प्रभाष जोशी के निधन की खबर और वरिष्ठ पत्रकारों के संस्मरणात्मक लेख छपे हैं , लेकिन रामकृपाल सिंह के संपादन में निकलने वाले अखबार नवभारत टाइम्स में किसी भी पन्ने पर सिंगल कॉलम की भी खबर नहीं है । देश के इतने बड़े संपादक का निधन होना , जिन्हें पत्रकारिता का शिखर पुरूष कहा जाता था , उनका निधन होना क्या नवभारत टाइम्स के लिए कोई खबर नहीं है ?
इसी ग्रुप के टाइम्स ऑफ इंडिया तक ने प्रभाष जोशी के बारे में नीरजा चौधरी की खबर प्रमुखता से छापी है । क्या रामकृपाल सिंह जी को जवाब नहीं देना चाहिए कि उन्हें प्रभाष जोशी के निधन पर सिंगल कॉलम की भी खबर क्यों नहीं छापी ? आपको इतना बता दें कि रामकृपाल सिंह उसी जनसत्ता सोसाईटी में रहते हैं , जिसमें प्रभाष जोशी रहते थे । मीडिया मार्ग पर इस आशय की पोस्ट पढ़कर एक सज्जन ने रामकृपाल सिंह के नाम एक पत्र मेल किया है , जिसमें उन्होंने कई सवाल उठाए हैं । एक तरफ राष्ट्रीय सहारा जैसा अखबार है जिसने पूरे दो पेज छापा है , तो दूसरी तरफ नवभारत टाइम्स है , जिसने इस खबर को छापा ही नहीं । नवभारत टाइम्स एक खबर क्यों नहीं छाप सकता ? क्या मैनेजमेंट के दबाव में प्रभाष जोशी के बारे में कोई खबर नवभारत टाइम्स में नहीं छपी ? अगर ऐसा होता तो फिर टाइम्स ऑफ इंडिया में कैसे खबर छपती ?

राष्ट्रीय सहारा , अमर उजाला , जनसत्ता , भास्कर और हिन्दुस्तान ने दी प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि , दैनिक जागरण में सिंगल कॉलम की खबर, नभाटा में खबर नहीं

आज के हिन्दी अखबारों में प्रभाष जोशी की शख्सियत को बयान करते कई लेख छपे हैं । कई वरिष्ठ पत्रकारों ने उनके निधन को एक युग का अंत बताते हुए अपने संस्मरण लिखे हैं । लेकिन सबसे हैरत हुई नवभारत टाइम्स को देखकर । इस अखबार में तो हमें तो किसी भी पन्ने पर खबर भी नहीं दिखी । नवभारत टाइम्स के किसी पन्ने पर प्रभाष जोशी के निधन के बारे में खबर न होना बहुत चौंकाने वाली घटना की तरह है । नवभारत टाइम्स के संपादक रामकृपाल सिंह उसी जनसत्ता सोसाईटी में रहते हैं , जहां प्रभाष जोशी रहते थे और जहां उनका निधन हुआ । कल भी सुबह से वो प्रभाष जोशी के घर पर थे लेकिन उनके अखबार में इस बारे में कोई खबर नहीं । क्या नवभारत टाइम्स के लिए प्रभाष जोशी कोई मायने नहीं रखते ? नवभारत टाइम्स के संपादकीय पन्ने पर अभय कुमार दुबे की एक टिप्पणी छापी गई है लेकिन क्या इतना काफी है ? रामकृपाल सिंह जैसे संपादक के रहते नवभारत टाइम्स ने प्रभाष जोशी के बारे में किसी पन्ने पर कोई खबर या उनके घर पर हुए जमावड़े और दिल्ली में उनके अंतिम दर्शन की कोई क्यों नहीं छापी ?
दैनिक जागरण दूसरा ऐसा अखबार है , जिसके लिए प्रभाष जोशी जैसे सूरज का अस्त होना कोई बड़ी खबर नहीं है । तभी तो दैनिक जागरण ने पहले पन्ने पर एक कोने में सिंगल कॉलम की खबर छापकर औपचारिकता पूरी कर ली है । प्रभाष जोशी के निधन पर सिंगल कॉलम की खबर छापकर दैनिक जागरण ने पूरी हिन्दी पत्रकारिता के साथ नाइंसाफी की है । प्रभाष जोशी जैसा संपादक और पत्रकार का गुजर जाना और एक पीढ़ी का अंत हो जाना दैनिक जागरण के लिए कोई मायने नहीं रखता । इसकी वजह क्या है इस पर कुछ बात करने से पहले आपको बता दें कि सबसे अधिक कवरेज किसी हिन्दी अखबार ने दिया है तो राष्ट्रीय सहारा ने। सहारा ने पहले पन्ने के टॉप पर तो बड़ी खबर छापी ही है , भीतर पूरे दो पन्ने प्रभाष जोशी की यादों को समर्पित है । सहारा के स्थानीय संपादक राजीव सक्सेना ने संपादकीय लिखा है । जवाहर लाल कौल , अच्युतानंद मिश्र सुशील कुमार सिंह , मनोज चतुर्वेदी और आलोक तोमर का लेख छपा है । इसके अलावा प्रभाष जोशी और उनकी पत्रकारिता के बारे में कई लोगों की राय को प्रमुखता से छापा गया है ।
दैनिक हिन्दुस्तान ने भी पहले पन्ने पर खबर के अलावा संपादकीय पेज पर राजेन्द धोड़पकर का लेख छापा है । अमर उजाला ने संपादकीय पन्ने पर वरिष्ठ पत्रकार देव प्रिय अवस्थी के लेख के अलावा प्रभाष जोशी का एक पुराना कॉलम भी छापा है । पहले पेज पर भी खबर प्रमुखता से छापी गई है । भीतर के पन्ने पर भी खबरें हैं । जनसत्ता तो प्रभाष जोशी का ही गढ़ा हुआ अखबार है । इस अखबार के पहले पन्ने पर खबर भी है और संपादक ओम थानवी का एक लेख भी । भीतर का एक पन्ना भी करीब करीब इसी खबर से भरा है लेकिन संपादकीय पन्ने पर किसी लेख का न होना थोड़ा अखड़ता है । पहले पन्ने पर बड़ी सी तस्वीर भी छपी है । दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने पहले पन्ने पर अग्रलेख तो लिखा ही है ओपेड पेज पर राजकिशोर का लंबा लेख है । भास्कर ने अच्छा कवरेज दिया है ।
दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर दो ऐसे अखबार हैं , जिनमें छपने वाली पेड खबरों के खिलाफ प्रभाष जोशी ने कैंपेन चलाया था । उनके निशाने पर दैनिक जागरण खास तौर से था । उन्होंने अपने स्तंभ में भी इसका जिक्र किया था । इसका मतलब ये निकाला जाए कि प्रभाष जोशी के निधन की खबर को नजरअंदाज करके दैनिक जागरण ने उसी का बदला लिया है ? अगर यह सच है तो भी इसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है ।

Friday, November 6, 2009

प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि देने के लिए उमड़े पत्रकार , उनका पार्थिव शरीर आज शाम पहुंचेगा इंदौर , कल अंतिम संस्कार

हिन्दी पत्रकारिता से शिखर पुरूष प्रभाष जोशी के निधन से स्तब्ध पत्रकारों का हुजूम आज सुबह उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़ा । गाजियावाद के वसुंधरा स्थित उनके निवास स्थान पर जाकर सैकड़ों पत्रकारों ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्प चढ़ाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी । प्रभाष जोशी को कल रात क्रिकेट मैच देखने के तुरंत बाद दिल का दौरा पड़ा था । कुछ ही देर में उन्हें अस्पता ले जाया गया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका । सुबह होते - होते उनके निधन की खबर पूरे देश में फैल चुकी थी । उनके घर के बाहर दिल्ली के सैकड़ों पत्रकार जमा हुए । हर पत्रकार की जुबान पर एक ही बात थी , प्रभाष जोशी के निधन से हिन्दी पत्रकारिता में एक ऐसा खालीपन आया है , जिसे कभी भरा नहीं जा सकता ।
प्रभाष जोशी दो दिन पहले ही लखनऊ से आए थे । आज सुबह उन्हें मेघालय की यात्रा पर जाना था । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । प्रभाष जोशी का पार्थिव शरीर दोपहर एक बजे गांधी शांति प्रतिष्ठान ले जाया गया , वहां कुछ देर तक उनके शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा , फिर राजकीय विमान से इंदौर ले जाया जाएगा । प्रभाष जोशी चाहते थे उनकी मौत के बाद नर्मदा के किनारे की अंतिम संस्कार किया जाए ।
प्रभाष जोशी के अंतिम दर्शन के लिए पत्रकारों के हुजूम में जितने लोग प्रिंट के थे , उतने ही टीवी के ।
राहुल देव, ओम थानवी , वेद प्रताप वैदिक , राजदीप सरदेसाई , परंजय गुहा ठकुराता , आलोक तोमर , रवीश कुमार , कुमार आनंद , गोविंद सिंह , मंगलेश डबराल , मनोरंजन भारती , सुशील बहुगुणा, अनिल बंसल , अशोक कुमार , वाशिन्द्र मिश्रा , आनंद प्रधान , अजीत अंजुम , विजय विद्रोही , पंकज पचौरी , अरविंद मोहन , एनके सिंह , सत्येन्द्र रंजन , पुण्य प्रसून वाजपेयी , जगदीश उपासने , प्रदीप सिंह , राम बहादुर राय , सतीश पेडनेकर , अरविंद मोहन ,प्रमोद पुष्करणा , नीलाभ मिश्रा , ओम थानवी , रामकृपाल सिंह , दीपक चौरसिया , अनिल चमड़िया , मिलिंद खांडेकर समेत सैकड़ों पत्रकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी ।
साहित्यकार राजेन्द्र यादव और अशोक वाजपेयी भी वहां पहुंचने वालों में थे । पत्रकारों के बीच यही चर्चा का विषय था कि प्रभाष जोशी के बाद उनकी जगह लेने वाला कोई दूर दूर तक नहीं है । उनके लेखन के कायल लोग उन्हें लगातार याद कर रहे थे ।

पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहे जाने वाले देश के वरिष्ठतम पत्रकार प्रभाष जोशी का निघन, इंदौर में होगा अंतिम संस्कार

हिन्दी पत्रकारिता के शिखर कहे जाने वाले प्रभाष जोशी का कल देर रात निधन हो गया । दिल्ली से सटे वसुंधरा इलाके की जनसत्ता सोसाईटी में रहने वाले प्रभाष जोशी कल भारत और अस्ट्रेलिया मैच देख रहे थे । मैच के दौरान ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा । परिवार वाले उन्हें रात करीब 11.30 बजे गाजियावाद के नरेन्द्र मोहन अस्पताल ले गए , जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया । प्रभाष जोशी की मौत की खबर पत्रकारिता जगत के लिए इतनी बड़ी घटना थी कि रात भर पत्रकारों के फोन घनघनाते रहे । उनकी मौत के बाद पहले उनका पार्थिव शरीर उनके घर ले जाया गया फिर एम्स । इंदौर में उनका अंतिम संस्कार किया जाना तय हुआ है , इसलिए शाम उनका शरीर इंदौर ले जाया जाएगा ।
प्रभाष जोशी के काफी करीबी और वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय के मुताबिक कल रात मैच के बाद उनकी तबियत खराब हुई और अचानक दौरा पड़ा । खबर लिखे जाने वक्त एम्स में उनका पार्थिव शरीर रखा है और उनके अंतिम दर्शन के लिए पत्रकारों का वहां पहुंचना जारी है । कुछ घंटे बाद उनके पार्थिव शरीर को जनसत्ता सोसाईटी स्थित उनके घर लाया जाएगा और शाम को इंदौर ले जाया जाएगा । 73 वर्षीय प्रभाष जोशी इस उम्र में भी लेखन और पत्रकारीय कार्यों के अलावा बहुत सक्रिय थे । अचानक उनका यूं चले जाने से सभी हतप्रभ हैं । कल रात तक लोगों से बात करने वाले प्रभाष जोशी पूरी तरह डूबकर मैच देख रहे थे । क्रिकेट के प्रति उनका प्रेम जगजाहिर था । लोगों को लग रहा है कि भारत की अप्रत्याशित हार ने उन्हें इस कदर विचलित किया कि उन्हें दौरा पड़ गया। अगर वो जिंदा होते तो इसी रविवार को उनके स्तंभ कागद कारे में क्रिकेट के इस मैच का आंखों देखा हाल और हारने की वजह पर सबसे सटीक विश्लेषण छाप होता ।
प्रभाष जोशी दैनिक जनसत्ता के संस्थापक संपादक थे। मूल रूप से इंदौर निवासी प्रभाष जोशी ने नई दुनिया से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। मूर्धन्य पत्रकार राजेन्द्र माथुर और शरद जोशी उनके समकालीन थे। नई दुनिया के बाद वे इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े और उन्होंने चंडीगढ़ में स्थानीय संपादक का पद संभाला। 1983 में दैनिक जनसत्ता का प्रकाशन शुरू हुआ, जिसने हिन्दी पत्रकारिता की दिशा और दशा ही बदल दी।
1995 में इस दैनिक के संपादक पद से रिटायर्ड होने के बावजूद वे एक दशक से ज्यादा समय तक बतौर संपादकीय सलाहकार इस पत्र से जुड़े रहे। प्रभाष जोशी हर रविवार को जनसत्ता में कागद कारे नाम से एक स्तंभ लिखते हैं । बहुत से लोग इसी स्तंभ को पढ़ने के लिए रविवार को जनसत्ता लेते हैं । लेखन के मामले में प्रभाष जोशी का कोई सानी नहीं था । ताउम्र वो लिखते रहे । हिन्दी का शायद ही कोई ऐसा संपादक हो , जिसने प्रभाष जोशी की तरह लगातार लिखा हो । 73 साल की उम्र में भी वो खूब भ्रमण करते थे । देश भर के कार्यक्रमों - सेमिनारों में उन्हें आमंत्रित किया जाता था । जेपी आंदोलन के दिनों में प्रभाष जोशी की सक्रियता विल्कुल अलग किस्म की थी । वो जेपी के बेहद करीब माने जाते थे । अपने पत्रकारीय जीवन में प्रभाष जोशी पत्रकारिता में शुचित बनाए रखने के लिए संघर्षरत रहे । अखबारों में पेड कंटेंट को लेकर उन्होंने विरोध किया और अपने स्तंभ में लिखकर इस प्रवृति को पत्रकारिता के लिए खतरनाक बताया । हिन्दी पत्रकारिता में हजारो ऐसे पत्रकार हैं , जो उन्हें अपना आदर्श मानते हैं । सैकड़ों ऐसे हैं , जिन्हें प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता का पाठ पढ़ाया है । दर्जनों ऐसे हैं , जो उनकी पाठशाला से निकलकर संपादक बने हैं लेकिन एक भी ऐसा नहीं , जो प्रभाष जोशी की जगह ले सके ।
प्रभाष जोशी के निधन के साथ पत्रकारिता की वो पीढ़ी खत्म हो गई , जिसपर पत्रकारिता को नाज था। राजेन्द्र माथुर के बाद प्रभाष जोशी ही थे , जिन्हें शिखर पुरुष कहा जाता था । क्रिकेट से उन्हें बेहद लगाव था । इतना लगाव कि को वो कोई मैच बिना देखे नहीं छोड़ते थे और मैच के एक - एक बॉल की बारीकी पर लिखते भी थे । सचिन के तो वो जबरदस्त फैन थे और देखिए मैच देखते हुए ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा । हार की तरफ बढ़ती भारतीय टीम को देखकर उन्हें बेचैनी हो रही थी । सचिन के शतक बनाने पर वो बहुत खुश हुए थे लेकिन उनके आउट होने पर खुशी मिश्रित दुख भी उनके चेहरे पर आया । फिर टीम हार की तरफ बढ़ने लगी । मैच देखते देखते प्रभाष जोशी को दिल का दौरा पड़ गया । जिस क्रिकेट को वो बेहद प्यार करते थे , उसी क्रिकेट के दौरान उनकी जान चली गई ।

Thursday, November 5, 2009

आजतक के अभिसार शर्मा जी , दिल पर हाथ रखकर कहिए क्या अपहरण कर सकते हैं एलियन ?

खबरिया चैनल आजतक के मशहूर एंकर अभिशार शर्मा अगर इंडिया टीवी वाले अंदाज में अपहरण करने वाले एलियन की खबर सुना रहे थे , तो अटपटा लग रहा था । अभिसार शर्मा संजीदा किस्म के एंकर और पत्रकार हैं । कई सालों तक एनडीटीवी इंडिया , बीबीसी और उससे पहले जी न्यूज में काम कर चुके हैं । अब अगर अभिसार भी इंडिया टीवी स्टाइल में एलियन की दुनिया के बारे में बता रहे हैं तो समझिए टीआरपी टीवी वालों को क्या - क्या करने को मजबूर करता है ।
आज दोपहर तीन बजे आजतक के स्पेशल बुलेटिन का विषय था ' उड़नतश्तरी से अपहरण ' । एलियन पर बनने वाले कार्यक्रम पूरी तरह से भ्रमित करने वाले और डराने वाले होते हैं । पिछले साल इंडिया टीवी ने एलियन पर कई दिन तक बहुत तमाशा किया था । गाय - भैंस और जानवरों का अपहरण करके ले जाने वाले तथाकथित एलियन पर इंडिया टीवी ने कार्यक्रम बनाया था । ग्राफिक्स के जरिए बताने की कोशिश की गई थी कि आसमान से यूएफओ कैसे जानवरों का अपहरण कर लेते हैं । आजतक ने भी आज इंडिया टीवी स्टाइल में अपहरण करने वाली तथाकथित उड़नतश्तरियों पर कार्यक्रम बनाया ।
अभिसार शर्मा जैसे एंकर भी जब दर्शकों को एलियन की काल्पनिक दुनिया में ले जाकर बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहे हैं तो इसे क्या कहा जाए । टीआरपी के लिए क्या - क्या नहीं करते हैं न्यूज चैनल। जब आजतक पर वॉयसओवर चल रहा था कि कहां से आते हैं एलियन .....किस दुनिया में रहते हैं एलियन ....तो मन कर रहा था उन्हें फोन करके कहूं - भाई साहब न्यूज चैनलों की दुनिया में रहते हैं एलियन ...स्टूडियो से निकलकर दर्शकों को बेवकूफ बनाते हैं एलियन ...। आजतक जैसा चैनल आज वो काम कर रहा है , जो इंडिया टीवी पिछले साल करके छोड़ चुका है । आजतक ने भी इंडिया टीवी की तरह ही वर्चुअल सेट बनाकर आसमान में उड़ते यूएफओ को दिखा रहा था , जो इंसानों को खींचकर ले जाता है ।

चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले पत्रकार जरनैल बने लेखक , 84 के दंगों पर तीन भाषाओं में छपी किताब

आपको याद है जरनैल सिंह ? कोई भूल भी कैसे सकता है उस जरनैल सिंह को जिसने गृहमंत्री पी चिदंबरम पर एक प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान जूता फेंका था । जूताकांड से चर्चा में आए जरनैल सिंह अब लेखक बन गए हैं 1984 के सिख विरोधी दंगों पर जरनैल सिंह की किताब - I Accuse : The anti sikh voilence 0f 1984 इसी शुक्रवार को रिलीज होने वाली है । अंग्रेजी के मशहूर प्रकाशक पेंग्विन ने इस किताब को प्रकाशित किया है । खास बात ये है कि जरनैल सिंह की ये किताब एक साथ तीन भाषाओं में आ रही है । हिंदी में उनकी किताब का नाम है - कब कटेगी चौरासी
गौरतलब है कि जरनैल सिंह करीब एक दशक तक दैनिक जागरण अखबार के संवाददाता रहे हैं । चिदंबरम पर जूता फेंकने वाली घटना के बाद उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था । उसके बाद से ही जरनैल सिंह इस किताब पर काम कर रहे थे । जिस समय दिल्ली में दंगे हुए थे , उस समय जरनैल की उम्र महज 11 साल थी । एक मासूम लड़के ने अपनी आंखों से दंगे होते हुए देखा था । जरनैल सिंह के मुताबिक दंगाई अपने हाथों में वोटर लिस्ट और सिख परिवारों की डिटेल लेकर चल रहे थे । उनके निशाने पर सिख थे और पुलिस चुपचाप तमाशे देख रही थी । सरकार ने आंख मूंद रखी थी । जरनैल की ये किताब अपने अनुभवों पर तो आधारित है ही , तथ्यों को इकट्ठा करके ये साबित करने की एक कोशिश भी है कि दंगों के दौरान किस तरह से सिखों को चुन - चुन करके मारा गया था ।

Wednesday, November 4, 2009

इस हफ्ते की टीआरपी - जी न्यूज , न्यूज -24 और डीडी न्यूज को फायदा , स्टार न्यूज और सहारा समय को नुकसान , आजतक नंबर वन पर बरकरार

आजतक नंबर पर कायम है । इंडिया टीवी पूरी ताकत लगा कर नंबर दो पर है । आजतक इंडिया टीवी से 2 प्वाइंट आगे है । दो हफ्ते पहले इंडिया टीवी ने आजतक को पछाड़ दिया था लेकिन एक ही हफ्ते बाद दोनों चैनल अपनी - अपनी जगह पर आ गए । चैनल नंबर तीन स्टार न्यूज इस हफ्ते लुढ़कर और नीचे आ गया है । नंबर तीन का उसका पोजीशन को बरकरार है लेकिन स्टार को इस हफ्ते करीब डेढ़ प्वाइंट का नुकसान हुआ है । चौथे नंबर के चैनल जी न्यूज के यह हफ्ता काफी फायदेमंद रहा । जी न्यूज एक प्वाइंट उछल गया है । पांचवे नंबर का चैनल आईबीएन -7 वहीं का वहीं है ।
छठे नंबर पर एनडीटीवी इंडिया है , जो टीआरपी बटोरने के लिए सारे तिकड़म भिडाने और मनोरंजन चैनलों का जूठा माल परोसने के बावजूद नंबर छह से ऊपर नहीं उठ पा रहा है । एनडीटीवी इंडिया के बाद कई महीनों से सहारा समय सातवें नंबर का चैनल है । कुछ हफ्ते पहले न्यूज 24 ने उसे पटखनी दी थी लेकिन सहारा फिर वापस अपनी जगह पर आ गया था । इस हफ्ते सहारा समय नीचे लुढ़का है । उसे एक फीसदी का नुकसान हुआ है , जबकि न्यूज 24 को . 6 फीसदी का फायदा । इसी वजह से न्यूज 24 इस हफ्ते सहारा समय को मात देने में कामयाब हो गया है । मार्के की बात यह है कि डीडी न्यूज भी इस हफ्ते उछला है ।

अब एक नजर इस हफ्ते की टीआरपी पर ....
आजतक - 18.9 , इंडिया टीवी - 16.7 , स्टार न्यूज - 14 , जी न्यूज - 11 , आईबीएन - 9 , एनडीटीवी इंडिया - 8.4 , न्यूज 24 - 5. 4 , सहारा समय - 5 , डीडी न्यूज - 4.4 , तेज -3.7 , लाइव इंडिया -2.1 , इंडिया न्यूज - 1.2
सबसे चिंताजनक हालत एनडीटीवी इंडिया की है । कुछ महीने पहले एनडीटीवी इंडिया ने अपने कंटेंट में टीआरपी बटोरने के लिए काफी फेरबदल किया । दर्शकों के लिए साफ - सुथरी खबर देने वाला एनडीटीवी इंडिया अब मसाला मिक्स बुलेटिन देने लगा । सुबह से अगर आप एनडीटीवी इंडिया को देखें तो रात तक में कई बार इस चैनल पर नाच -गाना और रियलिटी शोज के वीडियो पर आधारित प्रोग्राम दिख जाएंगे । इतना करके भी एनडीटीवी इंडिया टीआरपी के रेस में आगे नहीं निकल पा रहा है । न घर का , न घाट का वाली हालत में पड़े रहने से बेहतर है , एनडीटीवी इंडिया अपने पुराने रुप में रहता। कम से कम उसे सबसे अलग तो माना जा रहा था ।

Tuesday, November 3, 2009

स्टार न्यूज ने शुरू किया एक नया शो , हर रोज सुबह आठ बजे स्टार खबर

स्टार न्यूज ने आज से एक नया शो शुरु किया है । नाम है - स्टार खबर । इस शो की खासियत यह है कि अखबार के पन्ने की तरह इस शो के चार पन्ने होंगे । हर पन्ने पर दो खबरें होंगी । कुल आधे घंटे के स्टार खबर में कुल 8 खबरें होंगी । एक - एक पन्ना स्क्रीन पर आता जाएगा और उस पन्ने की खबरें एंकर बताते जाएंगे । फिर स्टोरी दिखाई जाएगी । सभी आठ खबरों की हेडलाइंस है , जो करीब दो मिनट की है । उसके बाद सभी आठ खबरों का पैकेज । पहले पन्ने पर लीड स्टोरी । दूसरे पन्ने पर बड़ी खबर । तीसरे पन्ने पर स्पोर्टस और चौथे पन्ने पर फिल्म की खबरें । छोटी - छोटी खबरें भी होंगी। मीडिया मार्ग के मिली जानकारी के मुताबिक रात की शिफ्ट में काम करने वाले प्रोडयूसर सुबह आठ बजे के लिए स्टार खबर नाम का ये शो तैयार करेंगे । आज से इसकी शुरूआत हो गई है । हमेशा लीक से हटकर कुछ नया सोचने वाले स्टार न्यूज के एडिटर शाजी जमां ने इस शो का कंसेप्ट तैयार किया है । युवा प्रोडयूसर कौशल लखौटिया को इसका इंचार्ज बनाया गया है । कौशल की टीम में मनोज कुमार , मुकेश पराशर , विजय शर्मा ,अनुराग , नृपेन्द्र सिंह , पंकज , सत्येश और शेखर हैं । नए और मेधावी लड़कों की टीम ने इस शो को सीनियर एंकर किशोर अजवाणी के मार्गदर्शन में लांच किया है।
कई दिनों से स्टार न्यूज अपने इस शो को लगातार प्रमोट कर रहा है । अपने - आपमें नए तरह का यह बुलेटिन दर्शकों को कितना पसंद आता है और इसे कितनी टीआरपी मिलती है , यह देखने वाली बात होगी । स्टार न्यूज के एडिटर शाजी जमां इस शो को लेकर काफी उत्साहित हैं ।

उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर झूठे मुकदमें , सरकार के इशारे पर पत्रकारों की कलम को कुंद करने की साजिश

उत्तर प्रदेश में पत्रकार सरकार के निशाने पर हैं । मायावती राज में कई पत्रकारों को झूठे मुकदमों में फंसाया गया है और कई फंसने वाले हैं । सरकार की करतूतों के खिलाफ लिखने वाले पत्रकार हिटलिस्ट में होते हैं । टीवी पत्रकारों की सरकार विरोधी रिपोर्टस पर नजर रखने के लिए चौबीसों घंटों चैनलों की निगरानी पहले से ही हो रही है । आईबीएन -7 के संवाददाता शलभ मणि त्रिपाठी को पिछले दिनों मुकदमें में फंसाया गया । प्रिंट के कई पत्रकार भी सरकारी तंत्र की साजिशों का शिकार हो रहे हैं । मीडिया मार्ग ने पहले भी इस बारे में कई खबरें दी है । आज जनसत्ता के लखनऊ संवाददाता अंबरीश कुमार ने इसी बारे में एक रिपोर्ट लिखी है । उनकी ये रिपोर्ट हम उनके ब्लॉग विरोध से साभार लेकर आपके लिए पोस्ट कर रहे हैं ।
उत्तर प्रदेश सरकार के निशाने पर आए पत्रकार - अंबरीश कुमार
लखीमपुर के पत्रकार बरकत अली अंसारी को आज जेल भेज दिया गया तो गोंडा में अमर उजाला के संवाददाता सरदार राजेन्द्र सिंह पिछले कई दिनों से फरार हैं। इटावा में नई दुनिया के संवाददाता नीरज मेहरे के खिलाफ शातिर बदमाशों पर लगाई जने वाली धारा सेवन क्रिमिनल ला अमंडमेंट एक्ट लगाकर गिरफ्तार करने की तैयारी है, वजह उन्होंने पुलिस के पैसे के खेल को कैमरे में कैद करने का जुर्म किया था। उत्तर प्रदेश में मीडिया किस तरह शासन-प्रशासन के निशाने पर है, इसकी यह एक बानगी है। उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर फर्जी मुकदमे दर्ज कराने की लंबी श्रंखला है। कभी वन्य जीव अधिनियम के तहत समीउद्दीन नीलू के खिलाफ फर्जी मुकदमा दर्ज कराकर जेल भेज दिया जता है तो कभी बुजुर्ग पत्रकार मेहरूद्दीन खान को लड़की भगाने जसे हास्यास्पद आरोप में जेल में डाल दिया जता है। पुलिस के कुछ अफसर इस काम में सिद्धहस्त हैं। इनमें गोंडा की पुलिस अधीक्षक एन पदमज का नाम सबसे ऊपर है। जब वे लखीमपुर में थी तो एक पत्रकार को जेल भिजवाया था और अब वे गोंडा में हैं तो वहां दूसरा पत्रकार फरार है।शुरूआत लखीमपुर से। लखीमपुर संवाददाता के मुताबिक यहां पुलिस प्रशासन व वन विभाग के अधिकारियों ने मिलकर एक पत्रकार पर धारा ३८९, २६/ ४१/४९, ४१९, ४२0, ४६७, ४६८ के तहत मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया। जिले में पत्रकार को जेल भेजने की यह एक दूसरी बड़ी घटना है। जनकारी के मुताबिक लखनऊ से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र वायस आफ लखनऊ के संवाददाता बरकत अली अंसारी ने पिछले दिनों अपने अखबार में दक्षिणी प्रभागीय वनाधिकारी आरसी ङा व उनके गोला वन रेंजर केपी सिंह, एके श्रीवास्तव से जुड़े सरकारी जंगलों के अवैध वन कटान के कई समाचार प्रकाशित किये थे। जिसके बाद अफसरों ने मीडिया पर अंकुश लगाने के लिए पत्रकार बरकत अली के खिलाफ फर्जीवाड़ा और जालसाजी के साथ वन्य जीव अपराध से संबंधित गैर जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया। पत्रकार बरकत अली जब अपने घर पर सो रहे थे। रात दो बजे थानाध्यक्ष मैलानी हेमन्त गौड़ व उनकी पुलिस ने वनरेंजर मैलानी एके श्रीवास्तव, वनरेंजर गोला केपी सिंह ने छापा मारा और गालियां देते हुए जन से मारने की धमकी दी। पत्रकार बरकतअली को पकड़ कर पुलिस थाना मैलानी ले आई। इसके बाद वहॉं पर तैनात दारोगा , श्याम लाल व आरएस यादव ने थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया। साथ ही कहा कि समाचार छापोगें तो इस बार जेल जा रहे हो तो अगली बार तुम्हारो इन्काउंटर होगा। इटावा से नीरज मेहरे ने अपने खिलाफ फर्जी मुकदमा दर्ज किए जने का ब्योरा देते हुए कहा-कल रात हमें जनकारी मिली कि पुलिस वाले चुनाव के नाम पर वाहन जब्त कर रहे हैं और जो पैसा दे दे रहा है, उसकी गाड़ियां छोड़ दे रहे हैं। यह जनकारी मिलने के बाद मैं मौके पर गया और एक टीवी चैनल के लिए इस दृश्य को कैमरे में कैद करने लगा। तभी एक पुलिस वाले की नजर पड़ी और उसने मेरा कैमरा छीन कर हाथापाई की। बाद में कैमरे से रील निकाल दी और थाने में मेरे खिलाफ अन्य धाराओं मसलन ३३२, ३५२, ३५३, ५0६ के साथ सेवन क्रिमिनल ला अमंडमेंट एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया।गोंडा के संवाददाता के मुताबिक पत्रकार सरदार राजेन्द्र सिंह का सरकारी अफसरों से सवाल पूछना महंगा पड़ गया। नाबगंज कस्बे के दो मोहल्लों में जब बाढ़ का पानी आ गया तो उस समय सैम्पलिंग पर निकले अफसरों से उन्होंने इसका औचित्य पूछ लिया। राजेन्द्र सिंह ने कहा था- जिलाधिकारी स्यंसेी संस्थाओं सामाजिक संगठनों से आगे आकर सहयोग की अपील कर रहे हैं, ऐसे में आप लोगों को छापामारी करके सैम्पुल भरने के लिए पूरे जिले में नाबगंज कस्बा ही बचा था। इसके बाद उसने सूचनाएं प्राप्त की और चला गया। इस बीच जब टीम सैम्पल भरके ापस लौटने लगी तो कुछ लोगों ने टीम को दौड़ा लिया, गाड़ी पर पथरा करके शीशे तोड़ दिए तथा सैम्पल के नमूने छीन लिए। इस घटना की स्तिृत रिपोर्ट अगले दिन अमर उजला समेत जनपद के समस्त समाचारपत्रों में फोटो के साथ छपी। उसी दिन रात में जिलाधिकारी के निर्देश पर मुख्य खाद्य निरीक्षक बी के र्मा द्वारा नाबगंज थाने में मुकदमा अपराध संख्या ४६९/२00९ अन्तर्गत धारा १४३, ३५३, ३५२, ३३६, ४२७, ५0६ आईपीसी ३/४ लोक सम्पत्ति क्षति निवारण अधि़ ७ क्रिमनल अमेण्डमेंड एक्ट के तहत दर्ज कराया गया जिसमें पत्रकार राजेंद्र सिंह समेत पांच नामजद दजर्नों अज्ञात लोगों को अभियुक्त बनाया गया है। अंबरीश कुमार, जनसत्ता